CU News: अकादमिक मंच पर ‘अहंकार’ का टकराव: कुलपति ने साहित्यकार को दिखाया बाहर का रास्ता, आत्मसम्मान में खाली हुआ सभागार
किसी भी विश्वविद्यालय का मंच वैचारिक विमर्श और संवाद के लिए होता है, लेकिन गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) में आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद 'अहंकार' की भेंट चढ़ गया। कुलपति प्रो. आलोक चक्रवाल द्वारा एक आमंत्रित अतिथि साहित्यकार को "तमीज" की दुहाई देकर सदन से बाहर निकालने के फैसले ने अब एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार मानते हुए देश भर के लेखकों में रोष है।

हिंदी विभाग और साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी का मुख्य विषय ‘समकालीन हिंदी कहानी’ था। लेकिन कार्यक्रम के दौरान मुख्य वक्ता की भूमिका में मौजूद कुलपति विषय से हटकर अपने व्यक्तिगत जीवन के संस्मरणों और उपलब्धियों का गुणगान करने लगे। जब साहित्यकार मनोज रूपड़ा ने उन्हें विनम्रतापूर्वक “मुद्दे पर लौट ने“ का सुझाव दिया, तो कुलपति ने इसे अपना अपमान मान लिया और लोकतांत्रिक गरिमा को ताक पर रखते हुए उन्हें कार्यक्रम से चले जाने को कह दिया।
संवाद की जगह विवाद हावी
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कुलपति इतने आक्रोशित थे कि उन्होंने आयोजकों को सख्त हिदायत दे दी कि मनोज रूपड़ा जैसे विद्वानों को भविष्य में कभी आमंत्रित न किया जाए। कुलपति का यह रवैया केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पूरी साहित्यिक बिरादरी के खिलाफ माना जा रहा है जो सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखती है।
साहित्यिक अस्मिता की रक्षा में बहिष्कार
कुलपति के इस व्यवहार को ‘अनुचित और तानाशाही’ करार देते हुए अन्य राज्यों से आए साहित्यकारों और विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों ने अपनी चुप्पी तोड़ी। उन्होंने कार्यक्रम का बहिष्कार करना बेहतर समझा। लेखकों का कहना है कि यदि एक विद्वान दूसरे विद्वान की बात सुनने का धैर्य नहीं रखता, तो ऐसे अकादमिक आयोजनों का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
बढ़ता विरोध: कैंपस से सड़क तक
इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर प्रो. चक्रवाल की जमकर किरकिरी हो रही है। जहां एक ओर विश्वविद्यालय प्रशासन इस पर मौन साधे हुए है, वहीं दूसरी ओर साहित्यकारों ने इसे अस्मिता की लड़ाई बना लिया है। रायपुर के अंबेडकर चौक पर आज होने वाला प्रदर्शन इसी आक्रोश का परिणाम है।








