छत्तीसगढ़
High Court: HC की सख्त नसीहत: शक और बदनामी से नहीं चलता रिश्ता, झूठे चरित्र आरोप बने तलाक की वजह
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक रिश्तों में बढ़ते अविश्वास और चरित्र पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि बिना प्रमाण जीवनसाथी पर अवैध संबंधों का आरोप लगाना मानसिक हिंसा के बराबर है। अदालत ने साफ किया कि पढ़े-लिखे और पेशेवर दंपतियों से भी संयम और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।

BILASPUR NEWS. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक रिश्तों में बढ़ते अविश्वास और चरित्र पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि बिना प्रमाण जीवनसाथी पर अवैध संबंधों का आरोप लगाना मानसिक हिंसा के बराबर है। अदालत ने साफ किया कि पढ़े-लिखे और पेशेवर दंपतियों से भी संयम और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।
जस्टिस रजनी दुबे और एके प्रसाद की खंडपीठ ने इसी आधार पर एक डॉक्टर पति की तलाक याचिका स्वीकार करते हुए इसे समाज के लिए चेतावनी बताया।
शिक्षित दंपति, लेकिन रिश्ते में शक की दरार
मामला सारंगढ़ निवासी डॉक्टर पति और भिलाई की महिला डॉक्टर से जुड़ा है, जिनका विवाह वर्ष 2008 में हुआ था। दोनों ही उच्च शिक्षित और सम्मानित पेशे से जुड़े होने के बावजूद वैवाहिक जीवन में भरोसा कायम नहीं रह सका। पति का आरोप था कि पत्नी ने लगातार उस पर चरित्रहीनता के आरोप लगाए, जिससे उसका सामाजिक और मानसिक संतुलन प्रभावित हुआ।
हाईकोर्ट ने माना ‘मानसिक उत्पीड़न’
हाईकोर्ट ने कहा कि जब बिना किसी ठोस साक्ष्य के पति या पत्नी के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाया जाता है, तो यह सीधे तौर पर मानसिक क्रूरता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे आरोप केवल निजी जीवन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि व्यक्ति की सामाजिक छवि और पेशेवर प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचाते हैं।
अलग रहना नहीं, आरोप बने तलाक का आधार
कोर्ट ने माना कि केवल अलग-अलग रहना तलाक का पर्याप्त कारण नहीं है, क्योंकि दोनों अप्रैल 2019 में साथ समय बिताते पाए गए थे। लेकिन बार-बार लगाए गए अप्रमाणित आरोपों ने वैवाहिक संबंध को असहनीय बना दिया, जिससे तलाक उचित ठहराया गया।




