छत्तीसगढ़
Ram Katha: कर्म ही आत्मा का भविष्य तय करता है, स्वर्ग-नरक की अवधारणा भ्रम है – संत विजय कौशल महाराज
मृत्यु के बाद न तो स्वर्ग है और न ही नरक, बल्कि मनुष्य को अपने कर्मों के अनुसार ही नया जीवन प्राप्त होता है। आत्मा भगवान के अधीन होती है और एक वर्ष के भीतर कर्मों के आधार पर उसे नया शरीर मिलता है। उक्त विचार संत विजय कौशल जी महाराज ने लालबहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में आयोजित भव्य रामकथा के दौरान श्रद्धालुओं की विशाल सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

BILASPUR NEWS. मृत्यु के बाद न तो स्वर्ग है और न ही नरक, बल्कि मनुष्य को अपने कर्मों के अनुसार ही नया जीवन प्राप्त होता है। आत्मा भगवान के अधीन होती है और एक वर्ष के भीतर कर्मों के आधार पर उसे नया शरीर मिलता है। उक्त विचार संत विजय कौशल जी महाराज ने लालबहादुर शास्त्री स्कूल मैदान में आयोजित भव्य रामकथा के दौरान श्रद्धालुओं की विशाल सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
संत विजय कौशल ने कहा कि मृत्यु के पश्चात दसवां, तेरहवीं जैसे कर्मकांड होते हैं, लेकिन आत्मा की गति कर्मों से निर्धारित होती है। उन्होंने बताया कि भूत-प्रेत और पिशाच भी जब संतों के संपर्क में आते हैं तो उन्हें सद्गति प्राप्त होती है। कथा मन को परिवर्तित कर सही दिशा दिखाती है और मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर करती है। जीवन में जब भटकाव आता है, तब कथा मार्गदर्शन का कार्य करती है। भगवान की कथा हमारे कलुषित मन को धोकर आत्मा को निखारने का माध्यम बनती है।
कथा के दौरान संत विजय कौशल ने नारद जी से जुड़ी रोचक प्रसंगों का वर्णन करते हुए कहा कि हम कहां बैठे हैं, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हमारा मन कहां है। उन्होंने काम, क्रोध और लोभ के दुष्परिणामों को उदाहरणों के माध्यम से समझाया और कहा कि मां, महात्मा और परमात्मा – ये तीनों ही जीवन की गंदगी दूर करते हैं।

अर्जुन और दुर्योधन के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि अर्जुन ने भगवान को चुना, जबकि दुर्योधन ने सेना को। यही कारण था कि विजय धर्म की हुई। साथ ही भीष्म पितामह और द्रौपदी से जुड़े प्रसंग के माध्यम से भगवान की लीला और कृपा को विस्तार से समझाया।
संत विजय कौशल ने मनु और शतरूपा के जीवन से दांपत्य मर्यादा, वैराग्य और तीर्थ यात्रा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैसे तीर्थों का प्रवास आवश्यक है, वैसे ही अपने घर को भी तीर्थ बनाना चाहिए।
राम जन्म की कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि राजा दशरथ की व्यथा, गुरु वशिष्ठ का मार्गदर्शन और श्रृंगी ऋषि द्वारा यज्ञ संपन्न होने के बाद भगवान नारायण के प्रकट होने से अयोध्या में खुशियों का वातावरण छा गया। चैत्र मास में भगवान श्रीराम के जन्म के साथ ही अयोध्या में उत्सव का माहौल बन गया और लोग भगवान के दर्शन को लालायित हो उठे।
कार्यक्रम के प्रारंभ में मुख्य संरक्षक अमर अग्रवाल, शशि अग्रवाल सहित अन्य गणमान्यजनों ने संत विजय कौशल का स्वागत किया। कथा के समापन पर भव्य आरती का आयोजन हुआ, जिसमें पूर्व सांसद लखन लाल साहू, बृजमोहन अग्रवाल सहित विभिन्न समाजों के प्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित



