छत्तीसगढ़

जनादेश का सम्मान लोकतंत्र की पहली शर्त, हारने पर ईवीएम को दोष देना कांग्रेस की दोहरी राजनीति : अजय चंद्राकर

बिलासपुर। लोकतंत्र की मजबूती, संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और राष्ट्रहित के विषयों पर सकारात्मक जनचेतना विकसित करने के उद्देश्य से भारतीय जनता पार्टी विधानसभा बेलतरा द्वारा ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर कृषि महाविद्यालय, सरकंडा में ‘राष्ट्र चिंतन (बौद्धिक संवाद)’ प्रबुद्धजन संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया।

बिलासपुर। लोकतंत्र की मजबूती, संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और राष्ट्रहित के विषयों पर सकारात्मक जनचेतना विकसित करने के उद्देश्य से भारतीय जनता पार्टी विधानसभा बेलतरा द्वारा ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर कृषि महाविद्यालय, सरकंडा में ‘राष्ट्र चिंतन (बौद्धिक संवाद)’ प्रबुद्धजन संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। संगोष्ठी में छत्तीसगढ़ शासन के पूर्व मंत्री एवं वरिष्ठ भाजपा विधायक श्री अजय चंद्राकर तथा बेलतरा विधायक श्री सुशांत शुक्ला ने प्रमुख रूप से सहभागिता की।

कार्यक्रम में पद्मश्री श्री रामलाल बरेठ, जिला पंचायत अध्यक्ष श्री राजेश सूर्यवंशी, श्री जनक देवांगन सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों के अध्यक्षों, चिकित्सकों, चार्टर्ड अकाउंटेंट, अधिवक्ताओं, सहकारिता क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों, किसानों एवं विभिन्न व्यवसायों और सामाजिक क्षेत्रों के प्रबुद्धजनों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए पूर्व मंत्री श्री अजय चंद्राकर ने कांग्रेस पर तीखा राजनीतिक प्रहार करते हुए कहा कि लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाने वालों को अपने राजनीतिक इतिहास का भी स्मरण करना चाहिए। जब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के माध्यम से चुनाव में भाजपा की सत्ता आई, तब कांग्रेस को इस व्यवस्था से कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन जब चुनाव परिणाम उसके पक्ष में नहीं आते तो ईवीएम और चुनाव आयोग पर सवाल खड़े किए जाने लगते हैं। लोकतंत्र में इस तरह के दोहरे मापदंड स्वीकार्य नहीं हो सकते।

श्री चंद्राकर ने कहा कि भारत का लोकतंत्र अत्यंत मजबूत और परिपक्व है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर बिना ठोस आधार के आरोप लगाना और जनता के जनादेश पर संदेह करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करने का प्रयास है। विपक्ष का दायित्व केवल सत्ता का विरोध करना नहीं, बल्कि राष्ट्रहित के विषयों पर सकारात्मक भूमिका निभाना भी है। उन्होंने कहा कि वैचारिक संवाद के मंच पर विपक्ष के लोगों को भी आमंत्रित किया जाना चाहिए, ताकि लोकतंत्र से जुड़े विषयों पर स्वस्थ बहस और सार्थक विमर्श हो सके।
बेलतरा विधायक श्री सुशांत शुक्ला ने अपने संबोधन में कहा कि लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक मर्यादाओं, संस्थाओं की निष्पक्षता और जनता के जनादेश के सम्मान से मजबूत होता है। आज कुछ राजनीतिक दल अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए समाज में भ्रम, अविश्वास और अस्थिरता का वातावरण निर्मित करने का प्रयास कर रहे हैं। परिवारवाद, तुष्टिकरण और वर्गभेद की राजनीति के माध्यम से सामाजिक समरसता को प्रभावित करना देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए उचित नहीं है।
विधायक श्री शुक्ला ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश विकास, सुशासन और राष्ट्र निर्माण के नए आयाम स्थापित कर रहा है।

ऐसे समय में राजनीतिक दलों को संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित, सामाजिक एकता और विकास के विषयों पर अपनी भूमिका निभानी चाहिए। लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष का होना आवश्यक है, लेकिन विपक्ष की भूमिका रचनात्मक और जिम्मेदार होनी चाहिए। केवल निराधार आरोपों के माध्यम से जनता के विश्वास और संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा को कमजोर करना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने कहा कि ‘राष्ट्र चिंतन’ केवल एक संगोष्ठी नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति हमारी जिम्मेदारियों को समझने, विचारों का आदान-प्रदान करने और समाज के प्रबुद्ध वर्ग को राष्ट्र निर्माण की सकारात्मक दिशा से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास है। लोकतंत्र में विचारों की भिन्नता स्वाभाविक है, लेकिन राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। स्वस्थ संवाद, वैचारिक स्पष्टता और सामाजिक सहभागिता से ही मजबूत एवं विकसित भारत का संकल्प साकार होगा।
कार्यक्रम में पद्मश्री श्री रामलाल बरेठ सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रबुद्धजनों की उपस्थिति ने संगोष्ठी को विशेष गरिमा प्रदान की। सामाजिक नेतृत्व, चिकित्सा, विधि, वित्त, सहकारिता, कृषि एवं अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों से जुड़े प्रतिनिधियों की सहभागिता इस बात का परिचायक रही कि राष्ट्र और लोकतंत्र से जुड़े विषयों पर समाज का प्रबुद्ध वर्ग गंभीरता से विचार-विमर्श करने के लिए तत्पर है।

उपस्थितजनों ने लोकतांत्रिक परंपराओं, संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा, राष्ट्र निर्माण और सामाजिक समरसता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार साझा किए।

संगोष्ठी का मूल संदेश स्पष्ट रहा कि लोकतंत्र में असहमति का सम्मान होना चाहिए, लेकिन राजनीतिक विरोध के नाम पर संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और जनता के जनादेश पर निराधार प्रश्न खड़े करना उचित नहीं है। देश को आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति नहीं, बल्कि सकारात्मक विचार, जिम्मेदार विपक्ष और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित राजनीतिक नेतृत्व की आवश्यकता है।

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