छत्तीसगढ़

Crime News: फर्जीवाड़ा कर क्लेम लेने की कोशिश: कोर्ट ने वकीलों की अग्रिम जमानत याचिका की खारिज, जानिए पूरा मामला

जांच के दौरान जब असली प्रेमिका कुजूर अदालत में पेश हुई, तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ। उसने बताया कि वह मृतक की पत्नी नहीं बल्कि उसकी देवरानी (जोनी कुजूर की पत्नी) है। उसने न तो किसी वकील को अधिकृत किया था और न ही किसी दावे पर हस्ताक्षर किए थे।

BILASPUR NEWS. फर्जी दस्तावेज तैयार कर मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) से मुआवजा हड़पने के प्रयास के मामले में शामिल अधिवक्ताओं को अदालत से बड़ा झटका लगा है। विशेष न्यायाधीश (एट्रोसिटी) लवकेश प्रताप सिंह बघेल की अदालत ने चार आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका को अपराध की गंभीरता देखते हुए निरस्त कर दिया है।

क्या है पूरा मामला?

​अभियोजन के अनुसार, सिविल लाइन थाने में दर्ज शिकायत के मुताबिक, 10वें अतिरिक्त मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में एक दावा प्रकरण (क्र. 2533/2025) पेश किया गया था। यह दावा प्रेमिका कुजूर व अन्य द्वारा मुरली यादव के विरुद्ध दायर किया गया था। इसमें प्रेमिका कुजूर को मृतक प्रभात कुजूर की पत्नी बताकर मुआवजे की मांग की गई थी।

​जांच के दौरान जब असली प्रेमिका कुजूर अदालत में पेश हुई, तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ। उसने बताया कि वह मृतक की पत्नी नहीं बल्कि उसकी देवरानी (जोनी कुजूर की पत्नी) है। उसने न तो किसी वकील को अधिकृत किया था और न ही किसी दावे पर हस्ताक्षर किए थे। मामले में यह पाया गया कि आरोपियों ने फर्जी महिला को प्रेमिका कुजूर बनाकर शपथ आयुक्त के सामने खड़ा किया और फर्जी दस्तावेज तैयार किए।

इनकी जमानत याचिका हुई खारिज

​अदालत ने जिन आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका (क्र. 732/2026) खारिज की है, उनमें शामिल हैं:

एन.पी. चंद्रवंशी (62 वर्ष)

भगवती कश्यप (50 वर्ष)

शुभम चंद्रवंशी (32 वर्ष)

सूरज वस्त्रकार (29 वर्ष)

अदालत की सख्त टिप्पणी

​मामले की सुनवाई के दौरान विशेष लोक अभियोजक धन सिंह सोलंकी ने जमानत का कड़ा विरोध किया। आरोपियों की ओर से तर्क दिया गया कि वे लंबे समय से वकालत कर रहे हैं और उन्हें फंसाया गया है।

​हालांकि, अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आरोपी अधिवक्ता हैं और उनसे विधि के ज्ञान की अपेक्षा की जाती है। उनके विरुद्ध गंभीर धाराओं (जैसे धारा 228, 229, 233, 246, 318, 335, 336, 338, 340(2) व अन्य) के तहत अपराध पंजीबद्ध है। कोर्ट ने माना कि न्याय के मंदिर में फर्जीवाड़ा करना एक गंभीर कृत्य है, जिसके चलते उन्हें अग्रिम राहत नहीं दी जा सकती।

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